Thursday, September 9, 2010

मैनपुरी में कम्प्यूटर शिक्षा :- खुद फर्जी और बांट रहे असली ज्ञान - प्रशासन बेखबर , छात्र हैरान !!

मैनपुरी में कम्प्यूटर सेंटर कमाई का एक अच्छा जरिया बन चुका है। जगह-जगह खुले कम्प्यूटर सेंटर में से कई सेंटर फर्जी रूप से संचालित हो रहे हैं। जिनकी किसी संस्था से मान्यता प्राप्त नहीं है।
कम्प्यूटर के बढ़ते प्रचलन से लगभग सभी छात्र-छात्राएं कम्प्यूटर में अपना भविष्य खोज रहे हैं। इसी का फायदा उठाते हुए जगह-जगह कम्प्यूटर सेंटर लोगों ने संचालित कर रखे है।
इन फर्जी सेंटरों पर कम्प्यूटर शिक्षा के नाम पर छात्र-छात्राओं का आर्थिक शोषण किया जा रहा है। सड़कों पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगाकर पंपलेट, बैनर आदि पर कम्प्यूटर सेंटरों की विशेषताएं लिखी है। वहीं कई सेंटरों के होर्डिग्स में तो जॉब देने की गारंटी भी है। इन विज्ञापनों को पढ़कर छात्र-छात्राओं की भीड़ कम्प्यूटर सेंटरों पर पहुंचती है। यदि जांच कर देखा जाये तो कई कम्प्यूटर सेंटर तो ऐसे हैं जिनका किसी भी संस्था से सम्बन्ध ही नहीं है।
इन सेंटरों पर कम्प्यूटर शिक्षा के नाम पर सिर्फ छात्रों को गुमराह किया जा रहा है। क्षेत्र में इन दिनों कम्प्यूटर सेंटरों की बाढ़ आ चुकी है। इसके अलावा कुछ कम्प्यूटर सेंटर ऐसे भी है जहां सेंटर पर थोड़ा बहुत सीख चुके छात्र ही शिक्षक बन बैठे हैं। ऐसे अधूरे ज्ञान वाले शिक्षक दूसरे को क्या सिखाते होंगे यह तो खुद ही समझा जा सकता है !! लेकिन इन अवैध संचालकों पर प्रशासन की नजर ही नहीं पहुंच रही है। ऐसे में आये दिन होने वाले फर्जीवाडो से इन छात्र-छात्राओं को बचाने वाला कोई नहीं दिखता !
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प्रशासन से यही उम्मीद की जा रही है कि वह अपनी नींद से जागे और जल्द से जल्द उचित करवाई कर इन छात्र-छात्राओं के भविष्य को बर्बाद होने से बचा लें !

Sunday, September 5, 2010

शशिशेखर ने हिंदुस्तान में पूरे किये एक साल


एक साल कब बीत गया पता ही नहीं चला....देश के सबसे बड़े मीडिया ग्रुप हिंदुस्तान में बतौर प्रधान सम्पादक शशिशेखर जी ने एक साल पूरा कर लिया है।लेकिन महज एक साल पूरा कर लेने के लिए वे बधाई और शुभकामनाओं के पात्र नहीं है....इन 365 रातों में उनके निर्देशन में छपे हिंदुस्तान ने एक नया और अनोखा कीर्तमान रचा है जिसके लिए हिंदी के सुधि पाठकों को शशिशेखर जी को बधाई और शुभकामनायें देनी चाहिए.4 सितम्बर 2009 को शशि जी को हिंदुस्तान ग्रुप की कमान सम्भालने के बाद हिंदुस्तान ने इन 365 दिनों में हर दिन जैसे कीर्तमान रचे है.पत्रकारिता की एक अनूठी मिशाल पेश की है.समाजिक कार्यों में दखल बढ़ाया.दबे-पिछड़े जनपदों की प्रतिभाओं को एक ऐसा रास्ता दिखाया...जो भारत के सुंदर भविष्य की तक़दीर बन सकती है.ये सब शशि जी की दूरदर्शिता का परिणाम मान सकते है.आधुनिक हिंदी पत्रकारिता में उनका योगदान नए पत्रकारों के लिए एक नजीर है.आज हिंदुस्तान की लोकप्रियता झारखण्ड जैसे राज्यों तक पहुँच चुकी है.हिंदुस्तान के पाठकों की संख्या ज्यामिति विधि से बड रही है......शशि जी बचपन से ही अखबार निकलना चाहते थे....और उन्होंने ऐसा किया भी॥ आज हिंदुस्तान के एक दर्ज़न से अधिक संस्करण देश के अलग अलग कोनों से प्रकाशित हो रहे है.कभी हार मानने वाले और सदा नया करने पर यकीन वाले शशि उन सम्पादकों की श्रेणी में है जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा और नई जमीन दी है.गजब के व्यवसायिक दबाव में हिंदी पत्रकारिता की रोचकता और महत्त्व को कैसे बनाये रखा जाकता है....कोई शशि जी से सीखे.उनकी पत्रकरिता में एक युवा की तरह नया पन और पाठकों को हर पल कुछ नया देने का जुनून उनकी पत्रकारिता में साफ़ झलकता है.....अखबार की बारीकियां और पाठक की रूचि....हर पहलु पर उनका विज़न कुछ अलग और असरदार लगता है.हिंदी अख़बारों में खबर के साथ फोटो की अहमियत शशि जी ज्यादा भला कौन समझेगा.... आज़ादी के बाद शशिशेखर हिंदुस्तान के ही नई बल्कि भारत के काबिल सम्पादकों में है....जो रचनात्मकता.....कलात्मकता और प्रयोगधर्मिता के लिए सदा जाने जायेगें....ऐसे सरस्वती पुत्र को हिंदुस्तान में एक साल पूरे होने पर ढेरों शुभकामनाये....
**हृदेश सिंह ***

Thursday, August 26, 2010

दबंग 'का म्यूजिक रिव्यू- हृदेश सिंह

''दबंग'' फिल्म का म्यूजिक बाज़ार में चुका है....इस फिल्म के कई गाने लोगों की जुबान पर हैं। फिल्म में कुल पांच गाने हैं। गीत जलीस शेरवानी, फैज़ अनवर और ललित पंडित की कलम से निकले हैं और सुर ''साजिद-वाजिद'' ने पिरोये हैं। पहला गाना ''तेरे मस्त मस्त दो नैन' राहत फ़तेह अली खान की सुरीली आवाज़ में है। इस पुरे एल्बम का यह एक मात्र गाना है जो कई बार सुना जा सकता है...इस गाने को सूफी रंग दिया गया है। फैज़ अनवर ने इस गाने को लिखा भी खूबसूरत है और राहत ने इस गाने को गाया भी शिद्दत से है। रूहानी सुकून और दिमाग को रोशन करने वाले इस गीत के बोल और सुर दोनों ही लाजवाब बन पड़े हैं। गाने के बोल के मुताबिक राहत ने शानदार गायकी पेश की है...फिलहाल ये गाना लोगों की जुबान से जल्द उतरता नहीं दिख रहा है। एल्बम का बेहद अलग मिजाज़ का दूसरा गाना ''मुन्नी बदनाम हुई'' की तो धूम मच चुकी है। इस गाने को केवल यूपी और बिहार में ज़बरदस्त लोकप्रियता हासिल हुई है बल्कि इसे लिखा और कम्पोज इस तरह किया गया है कि डिस्को और पब में भी यह नंबर वन है। हिंदी भाषी खास तौर पर भोजपुरी बेल्ट में इस गाने को लोग पसंद कर रहे हैं। गीत में संगीत को देसी टच दिया गया है। कई जगह आप को लगेगा ये ठेठ भोजपुरी स्टायल का गीत है..गाने को ''ममता'' और ''ऐश्वारिया'' ने पूरे मन से गया है। तीसरा गाना इस अलबम का है 'चोरी किया रे जिया रे'..सोनू निगम और श्रेया घोषाल ने इस गीत को गाया है। पहले और दुसरे के मुकाबले ये गाना कम असर रखता है। गाने के बोल में दम है लेकिन साजिद-वाजिद के सुर थोड़े से मद्धम पड़ जाते है। इस अल्बम की खासियत है कि इसमें हर मूड के गाने शामिल किये गए है। आज के श्रोताओं का पूरा ध्यान रखेने की कोशिश की गई है। चौथा गाना इस फिल्म का टाइटल गीत है. उड़ उड़.दबंग...ये गीत सुखविंदर सिंह और वाजिद ने गाया है। सुखविंदर ने मांग के मुताबिक इस गाने को गया है। इस तरह के गाने वही गा सकते है, एक बार फिर ये सुखविंदर ने साबित कर दिया है। ''ओमकारा'' और ''दस'' फिल्म के टाइटल गीत के तरह ही ये गाना है जिसे दोनों गायकों ने बखूबी गया है। इस अल्बम का अंतिम और पांचवां गाना क़व्वाली तर्ज़ पर पेश किया गया है। गाने के बोल खासे चलताऊ है और समझने में आसान भी है। पहला अन्तरा खुबसूरत बन गया है. इसलिए कुछ समय के लिए ये गीत गुनगुनाया जा सकता है. इस पुरे अलबम की खासियत है कि गाने के बोल कुछ गानों में लाज़बाव है। "जलीस शेरवानी" की कलम से निकले गीत असर रखते है.पहला और आखिरी गीत ''त्रिवेणी छंद विधा'' की तकनीक से लिखा गया है. लफ्जों का सुंदर इस्तेमाल भी है इन गीतों में. संगीत की बात करें, तो मामूली खामियों आलावा दबंग की दबंगई का असर कुछ समय के लिए संगीत प्रेमियों पर दिखाई दे सकता है
www.mediamanch.com
यहाँ पर भी इस समीक्षा को पढ़ सकते है.




Monday, August 23, 2010

राह दिखाओ मैनपुरी के युवाओं को....

मैनपुरी में युवाओं की संख्या ढाई लाख के लगभग है...मैनपुरी के युवाओं को शिकायत है की मैनपुरी में उनके के लिए कुछ नहीं है... मैनपुरी की अधिकतर युवा आगरा.दिल्ली और लखनऊ जैसे बड़े शहरों में उच्च शिक्षा लेते है..बाद में ये युवा बड़े शहरों में ही शिफ्ट हो जाते है....कभी किसी पर्व ये युवा अपने घरों की और कुछ दिनों के लिए आते है....प्रवासी की तरह.... ये सिलसिला बीते दो दशकों से देख रहा हूँ.इन युवाओं में अधिकतर मेनेजमेंट और इंजीनियरिंग के फील्ड से होते हैं.इन युवाओं को मैनपुरी में अनगिनत खामियां नजर आती है....और गिनाते वक़्त समय फक्र महसूस करते है...मेरी अक्सर मैनपुरी से बाहर रह रहे युवाओं से बातचीत होती रहती है....सब के पास समस्याएँ है....लेकिन हल किसी के पास नहीं है....में उनसे हमेशा इन समस्याओं को हल करने के बारे में सवाल करता हूँ....बात नेता और प्रशासन पर आकर खत्म हो जाती है...एक दौर था....90 का दशक. मैनपुरी में युवाओं की धूम थी.युवाओं की टोलियाँ हर दिन कुछ कुछ करती थी.
कई युवा संगठन थे,अच्छा काम करते थे.प्रतियोगिता....सांस्कृतिक प्रोग्राम.....गोष्ठियां.....सब कुछ करते थे जो युवाओं को करने चाहिए.बुजुर्गों की इज्ज़त.......महिलायों का सम्मान.....अधिकारों के हनन पर गुस्सा..प्रदर्शन...ये सब दौर बचपन में देखा था....यादें ही अब ज़ेहन में...फ़िरोज़ अहमद...पवन कुमार....पंकज.....गजेन्द्र.....राजपाल सिंह.....जितेन्द्र गुप्ता.....नीरज बैजल....अमित गुप्ता....राहुल चतुर्वेदी.....ऐसे दर्जनों युवा थे...जिनके नाम मुझे याद है.शायद इनके काम के कारण....गुज़रे एक दशक में मैनपुरी का कोई ऐसा युवा नजर नहीं आया जो मेरे ज़ेहन में हो.... जिसका नाम मुझे याद हो...वक़्त गुज़रे ज्यादा नही हुआ है...लेकिन सोचता हूँ तो लगता है वक़्त बहुत हो गया है....मैनपुरी में कई युवा सगठन थे....स्वामी विवेकानद युवा समिति....मैनपुरी क्लब.....एकमन क्लब....लाइंस क्लब...खेल में इलेवन स्टार...राजनीति में स्टुडेंट क्लब.... दर्जनों संगठन थे.
जो
युवाओं के लिए काम करते थे....उनकी आवाज़ उठाते थे....यही नहीं बुजुर्गों को नई तकनीक की जानकारी भी देते थे...मैनपुरी को इन युवाओं पर हमेशा नाज़ रहेगा....आज ये सभी युवा सफल है...इन में से कई युवा अधिकारी हैं और कुछ अपने फील्ड के मास्टर है...ये युवा तब सक्रिय थे....जब संचार के साधन मैनपुरी में आज की तरह विकसित नहीं थे...नेट नहीं था...शानदार स्कूल नहीं थे....जानकारी के लिए बस दूरदर्शन और रेडियो था....आज सब कुछ है तकनीक है संसाधन है....तब युवाओं का ये हाल है.....बदलाव के सबसे बड़े समर्थक युवा होते हैं...लेकिन ये बात मैनपुरी में नजर में नहीं आती...आज युवाओं का नैतिक पतन हो रहा है....बीते तीन सालों में मैनपुरी का युवा अपराध की और मुड़ा....मैनपुरी में होने वाले अपराधों में युवा अपराधिओं का प्रतिशत 60 से अधिक है...इन युवाओं में सबसे ज्यादा 20 से 30 की उम्र के हैं....मारपीट...लुट...हत्या...वाहन चोरी...चैन स्नेचिंग....छेड़खानी जैसे अपराधों में सेकड़ों युवा जिला बदर.गेंगस्टर की कार्रवाई को झेल रहा है,कई शातिर अपराधी बन चुके है....अपराध की दुनिया में उनका नाम है.
मैनपुरी
के युवाओं को सही राह दिखाना बेहद जरुरी है...इसमें प्रबुद्धजनों.....प्रशासनिक अधिकारिओं और शिक्षण संस्थाओं को आगे आना होगा...मैनपुरी के विकास में जनता को अपने हिस्से का काम करना होगा...एक दुसरे का मुहं ताकने की आदत को त्यागना होगा.....अपने बच्चे के साथ दुसरे के बच्चे को भी आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करना होगा...साथ ही युवाओं को भी जन्मभूमि के लिए कुछ करना होगा जिससे खुद में वे कह सकें....हाँ मैं मैनपुरी की मिटटी में पैदा हुआ हूँ

***हृदेश सिंह****